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Hindi Poem - Nine Hottest Days - नौ तपा - Re Kabira 129

जब से नौ तपा लगा  पारे पर रोज रिकॉर्ड  तोड़ने का बुखार चढ़ा रात को १२ बजे तक  लगे लू के थपेड़ों का डर जहाँ देखो वहाँ छपी असहनीय भीषण  गर्मी की खबर अख़बारों की सुने अगर  पृथ्वी खतरे में है मूरख! प्रकृति नहीं मानुष  खतरे में है  जब सुबह ४ बजे मम्मी उठती धरा तब भी आहें भरती गहरी साँसे ले दोनों आलोम-विलोम गिनती  सटक से पानी जैसे ही  रात भर के प्यासे  धूल की परतों में लिपटे  पौधों के झुलसे पत्तों पर पड़ता  उनका दिल ख़ुशी से झूम उठता क्यारियों की लाल माटी महकती  ऊँची डाल पर बैठी मैना चहकती धीरे-धीरे  सूरज की किरणें  क्षितिज चीरती  रात की चादर से सरकाके थके बादलों को लालिमा से सजाती तालाब के पानी को लाखों  माणिक मोतियों से चमकाती सुबह की धूप  चुपके से मेरे कमरे में झाँकने चली आती  हंसों के झुण्ड शोर मचाते  कहीं दूर उड़े चले जाते साथ स्कूल जाने के लिए बच्चे  जल्दी घर से निकल जाते शायद  धूप से लगी हो दौड़  छाँव ढूंढ़ने की हो होड़ धूप में मत खेलना  मम्मियाँ जितना भी समझाले  बच्च...

Hindi Poem - Ram - मैंने राम को देखा - Re Kabira 127

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मैंने राम को देखा  न मंदिर में देखा, न महलों में देखा  न मूरत में देखा, न सूरत में देखा न सागर की गहराइयों में देखा, न हिमालय की ऊंचाइयों में देखा न मंत्रों में देखा, न ग्रंथों में देखा न रत्नों में देखा, न मालाओं में देखा न चंदन में देखा, न भभूतों में देखा  न सरयू में देखा, न गंगा में देखा  न रामायण में देखा, न अयोध्या में देखा  न भक्ति भजनों में देखा, न शक्ति गर्जनों में देखा मैंने राम को देखा, पिता की चिंता में, माँ की ममता में, पत्नी की शिकायत में, बच्चों की चाहत में, मैंने राम को देखा,  दास लगे तुलसी के नाम में,  सिया से साथ लिखे राम में,   मैंने राम को देखा,  भक्तों के भीतर छुपे हनुमान में, रावण के जीवन ज्ञान में, मैंने राम को देखा, इंसानों के अंदर इंसान में,  मनुष्यों के हृदय मानव मान में, राम सिया राम, सिया राम, जय जय राम। आशुतोष झुड़ेले Ashutosh Jhureley @OReKabira -- o Re Kabira 127 o --

Hindi Poem - Aadit is 18 - १८ का आदित - Re Kabira 126

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आदित, अब हो गए हो तुम १८ के, अब बच्चे नहीं, लड़के नहीं,  कहलाओगे व्यस्क युवक - Adult Grown Up!  तुमसे हम बोलेंगे, क्यों अभी भी इतनी शैतानी करता है? अब तो थोड़ा ज़िम्मेदार होना बनता है? क्यों नहीं अब पापा की सुनता है? और अभी भी मम्मी के बिना तेरा काम  क्यों नहीं चलता है? पर तुम अपना, बचपना दिल में हमेशा साथ रखना, नटखटाहट को जेब में लेकर चलना, नए दोस्त बनाना, नई जगहों को जाना, बिना डरे, बस आगे कदम बढ़ाते जाना। तुम अपनी, उछालों से गगन के उस पार चाँद को छूना, आँधियों पर हो सवार बादलों को चूमना, अपने सारे सपनों को तितलियों संग बुनना, अपनी दुनिया में खुशियों के खूब रंग भरना। आदित, अब हो गए हो तुम १८ के, अभी तो नया सफ़र शुरू हुआ है, अब तो तुझे बड़ा होने का असली मौक़ा मिला है, अब अपनी नई आज़ादी को  सही दिशा में ले जाओ, और कल को अपना बनाओ।  और यदि, कभी डर लगे, घबराहट हो, कदम डगमगायें, तो याद रखना, अदिति तेरे पीछे है चले,  तेरी मम्मी हमेशा तुझे पास है मिले, और जहान में कही भी, कभी भी,  तेरे पापा तेरे साथ हैं खड़े। खूब खेलो, खूब पढ़ो, खूब बढ़ो, खूब ख़ुश रहो! ऐसे ...

कुछ किस्से कहानियाँ - मति - Hindi Stories - Wisdom - Re Kabira 125

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मति "जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेहि" - बब्बा ने अखबार में छपे हुए लेख को पढ़कर, पन्ना मेरी तरफ आगे बढ़ा दिया। "तुमको ये पढ़ना चाहिए" - बब्बा ने कहा। मैंने पूरा लेख पढ़ा, १० दोहों के माध्यम से दैनिक जीवन, नैतिकता और व्यवहार को लेकर किसी ने निबंध लिखा था। जब पढ़ने के बाद मैंने अखबार के पन्ने बब्बा को वापस दिए, उन्होंने उस लेख को दोबारा पढ़ा। "एक दोहा तो शायद तुलसी रामायण का है, दूसरा पता नहीं कहाँ से लिया गया है" - बब्बा ने एक बार फिर से दोहे तो पढ़ा। बब्बा बची हुई अखबार की खबरें पढ़ते रहे और मुझे खेल वाले पृष्ठ पकड़ा दिए। बीच-बीच में बब्बा ने मेरी पढ़ाई सम्बंधित सवाल पूँछे। आगे क्या पढ़ना है? कौनसे विषय पढ़ते हो?, स्कूल में कैसे नंबर आते हैं? और बहुत सी बातें हुई। अख़बार को खिड़की पर रखने दिया और इशारा कर के तख़त पर बुलाया।  मैं समझ गया था कि मुझे उनके पैर दबाना है।  पता नहीं किस बात से उनका ध्यान तुलसीदास जी के दोहे पर फिर से गया। उन्होंने मुझ से बोला - "तुमको - जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेहि - का मतलब समझ आया?" मैंने कहा - ...

Hindi Poem - Who Am I? - माँ मैं कौन हूँ? - Re Kabira 0124

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हे माँ, ओ माँ, मैं कौन हूँ? माँ मैं कौन हूँ? मैं शक्ति, स्थिरता, त्याग हूँ  मैं भक्ति, प्रेम, तपस्या हूँ  मैं कृपा, क्षमा, करुणा हूँ  मैं त्रिलोक त्रिदेव त्रिदेवी रचेयता हूँ  मैं सत्य, न्याय, धर्म रक्षक हूँ मैं अस्त्र, शस्त्र, सर्वास्त्र धारी हूँ  मैं दुःख, दरिद्र, द्वेष नाशिनी हूँ  मैं दया, दिव्य, दैव्य स्वरूप हूँ  मैं ऋद्धि, शुद्धि, सिद्धि दात्री हूँ  हे माँ, ओ माँ, मैं कौन हूँ? माँ मैं कौन हूँ? हे माँ शैलपुत्रि! मैं अहल्या, सीता और उर्मिला भी हूँ हे माँ ब्रह्मचारिणी! मैं तारा, मंदोदरी और द्रौपदी भी हूँ हे माँ चंद्रघंटा! मैं सावित्रि, राधा और मीरा भी हूँ हे माँ कूष्मांडा! मैं पद्मावती, दुर्गावती और मणिकर्णिका भी हूँ  हे माँ स्कंदमाता! मैं कौशल्या, देवकि और गांधारी भी हूँ हे माँ कात्यायनी! मैं कथुआ, हाथरस और पार्क-लेन की निर्भया भी हूँ हे माँ कालरात्रि! मैं जात-पात, धर्म-कर्म, धन-ज्ञान के यज्ञ की बलि भी हूँ  हे माँ महागौरी! मैं तेजाब, हिंसा, और बलात्कार की पीड़ित कन्या भी हूँ  हे माँ सिद्धिदात्री! मैं प्रताड़ना, अपमान और उल्लंघन की...

कुछ किस्से कहानियाँ - बऊ का भूत - Hindi Stories - Great Grandmother's Ghost - Re Kabira 128

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बऊ का भूत  अभी भी ऐसा लगता है मानो, बऊ कुठरिया में जीने पास वाले दरवाज़े पर ही बैठी है।  पूर्णतः श्वेत केश, जैसे जीवन के सारे रंग उड़ गए हों। समय की मार से चेहरे पर झुर्रियाँ, मंद दृष्टि, बिना दांत के मुख में होंठ अन्दर धंसे हुए, वृदावस्था से टूटा हुआ देह। केवल पुरानी पतली सफेद धोती लपेटे, एक घुटना सीने से लगाए। दुसरे घुटने पर कांपते हाथ का सहारा लिए, पत्थर के ठन्डे फर्श पर, पिचकी हुई थाली और इधर-उधर लुढ़कता हुआ लोटा रखे, कुठरिया के दरवाज़े पर बैठी हों।  घंटो सीढ़ियों पर थकी हुई कमजोर आँखें और कान लगाए, परछाइयों का पीछा करते बैठी रहतीं।  जो भी, जब बी निकलता, उससे उम्मीद की रुकगा, कुछ कहेगा, कुछ सुनेगा। अकेली खुद से बड़-बड़ाती रहतीं। हम लोग जब भी निकलते, पास बुला कर पूँछती कौन हो, किसके मोड़ा हो। प्यार से पूरे चेहरे पर हाथ फेरती और गोदी में बैठा लेती। उनकी बस ये ही छवि अंकित है और ऐसे अंकित है जैसे कल की ही बात हो। बऊ, मेरी पर-दादी, का निधन जब मेरी आयु ४-५ वर्ष की होगी तब हो गया था। जब भी उनकी बात होती है, उनका चेहरा, उनके कपड़े, उनका कमरा साक्षात् सामने उभर कर आ जाता है। उनकी...

Hindi Poem - Nest - घरौंदा - Re Kabira 0123

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घरौंदा  दुकाने बिकीं, मकान बिके,  बिक गए बड़े-बड़े गोदाम, बिका सोना, चाँदी बिकी,  बिका  पीतल का सामान, झूमर, झालर, शीशे, हांड़ी, बर्तन बिके, कटोरी-गिलास, लोहा-लंगड़ बिका, बिक गई ४ फुटा दो नाली की शान, बेच-बेच कर ढका रहा छुपा रहा  मान, धुप में, छाँव में, बारिषों की फुहार में, गगन की गर्जन में, धरा की कंपन में, शादी-विवाह, चौक, तीज, त्यौहार में, खुशियों के रंग में, दुःखों के रण में, ऊँचा पूरा, हवा दार, सुंदर और आलिशान, बड़े-बड़े खिड़की दरवाज़े,और विदेशी शीशे, गद्दी, मंदिर, आँगन और खूबसूरत छतजे, कितने जीने और छोटे-बड़े कितने ही कमरे,  अँगरेज़ चले गए, रजवाड़े मिट गए, कितने नेता आए, कितने चले गए, थका-हारा, समय का फेर देखता रहा, मेरे बब्बा का घर वहीं पर डटा रहा, गिरती दीवरों को, टपकती छतों को,  उजड़ती तुलसन को, उखड़ते आँगन को,  जब हमने उनके हाल पर छोड़ दिया, घर को हिसाब‑किताब के तराज़ू में तौल दिया, चोरी-धोखा, छल-कपट,  लालच-तृष्णा,  लानते-धमकियाँ,  सच  की  बौखलाहट,  झूठ-फ़रेब  की परतों में लिपटी , दिखावे की चा...